नौ बहने जो बनी आंछरी (अप्सराएं)

निमेष सिंह कंडारी


गढ़वाल में एक जागर प्रचलित है -

चैंदाणा गौ मंजै कनु होलु राजा आशा रौत।

आशा रौत की होलि, कनी होलि छै रामी बौराणी।

छै राण्यो मांजे कैकु मुसु भि नि जन्म्यो।।

इस गढ़वाली जागर के बोल में आंछरियों अर्थात अप्सराओं के जन्म का वर्णन है। उपरोक्त पंक्तियों का अर्थ है - चैंदाण गांव में राजा आशा रावत का राज है। उसकी छः रानियां हैं, लेकिन वह निसंतान है। आशा रावत कभी यह सोचकर उदास हो जाता कि उसके बाद इतनी अधिक जमीन, जायदाद, राजकाज कौन संभालेगा। एकदिन राजा ने सभी छः रानियों को बुलाया और उनके सामने वह अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख पाया। वह रोने लग गया। रानियों ने पूछा कि राजा जी क्या हुआ जो आप इतने उदास हैं और रो रहे हैं। राजा ने कहा, ‘‘मेरा इतना बड़ा राजकाज है, लेकिन मैं निःसंतान रह गया, मेरे बाद इस संपत्ति का क्या होगा, इसीलिए रो रहा हूं।’’

राजा की बड़ी रानी का नाम बुटोल्या था। उसने कहा, ‘‘पुरुष को इस तरह से रोना शोभा नहीं देता। राजा हो तो राजा की तरह सोचो, सातवां विवाह करो। मेरे स्वामी आप थात के गांव जाओ और वहां सातवां विवाह करके ले आओ।’’ बड़ी रानी के कहने पर राजा थात के गांव चल पड़ा। राजा बन-ठन के अपनी मखमली टोपी पहनकर थात के गांव में दीपा पंवार के घर पहुंचा। दीपा पंवार ने राजा का खूब आदर सत्कार किया और उसने थात के गांव आने का कारण पूछा, तब राजा ने उसे अपनी व्यथा बताई और कहा कि वह निःसंतान है। छः रानियों में से किसी की भी संतान नहीं हुई। राजा कहता है, ‘‘मैं यहां आपकी छोटी बहन देवा का हाथ मांगने के लिए आया हूं। मैं उसे अपनी सातवीं रानी बनाना चाहता हूं।’’ दीपा पंवार ने कहा, ‘‘हे राजा, आप परेशान ना हों, मैं अपनी छोटी बहन की शादी आपसे कराने के लिए तैयार हूं।’’ राजा का सातवां विवाह धूमधाम से होता है। देवा दुल्हन बनकर चैंदाण पहुंच जाती है।

कुछ दिनों बाद रानी देवा गर्भवती हो जाती है। नौ महीने बाद उसने नौ बेटियों को जन्म दिया। आशा रावत खुश हो जाता है। राजा ने अपनी नौ बेटियों के नाम कमला रौतेली, देवी रौतेली, आशा रौतेली, बासदोई रौतेली, इगुला रौतेली, बिगुला रौतेली, सदेई रौतेली और गरदुआ रौतेली रखे। ये नौ बहने आम बच्चों जैसी नहीं थीं। वे चमत्कार से कम नहीं थीं। कहते हैं कि जब पांच दिन की थी तो अपने महल की दीवारों और छज्जे पर चलने लगी थीं और बारह वर्ष में ही वे सुंदर युवतियां बन गई थीं। उनको सजने-संवरने का शौक था। एकदिन वे अपने पिताजी के पास गई और उन्होंने उनसे सुंदर कपड़े और गहने बनवाने के लिए कहा। राजा के पास किसी चीज की कमी नहीं थी। उसने खुशी-खुशी अपनी सभी लड़कियों के लिए सुंदर कपड़े और गहने बनवा दिए। नए वस्त्र और सोने की नथ, शीशफुल, गुलुबंद, झालर वाली बेसर, अंगूठी, पायजेब पहनकर उनका रूप खिलने लग गया। वे सभी नौ बहनें सोलह शृंगार करके गांव के मंडाण में गई और वहां सुंदर नृत्य किया। रात होने से पहले सभी बहने अपने घर गईं। रात को जब वे गहरी नींद में थीं, तो उन सभी नौ बहनों के सपने में सेम का नागराजा आया। उन्होंने सपने में देखा कि भगवान उनके साथ अठखेलियां कर रहे हैं। सेम के नागराजा ने उन्हें अपनी रानी बनाकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए। मतलब उनका कौमार्य भंग कर दिया। सुबह उठकर उन सभी नौ बहनों ने टीके की थाली निकाली और गगरी उठाकर पंदेरा चली गईं। वहां उन्होंने स्नान किया। उन्होंने सुंदर कपड़े पहने, गहने पहने, गगरी पानी से भरी पर वे घर नहीं लौटीं।

कहते हैं कि उन्होंने अपने गांव की तरफ देखा तो वहां अंधेरा हो रखा था। उन्होंने जंगल की तरफ देखा तो वहां धूप खिली हुई थी। वहां उनकी नजर फूलों पर पड़ी, जहां कई तरह के लाल, पीले फूल खिले हुए थे। फूल देखकर उनका मन हर्षित हो गया। वे जंगल चली गईं और उन्होंने अपने लिए फूलों की माला बनाई। माला पहनकर वे इंद्र की अप्सरा जैसी लगने लगीं। इसके बाद वे अपने पुरोहितों के गांव चली गईं, जहां उनकी सांकरी यानी दुपट्टा छूट गया। उस दिन से उस गांव का नाम सांकरी पड़ गया। गांव वालों ने उनका खूब आदर सत्कार किया। उनको खीर खिलाई। वहां से वे नौ बहने अपने मामा के गांव के लिए चल दीं। उनका मामा दीपा पंवार अपनी भांजियों को देखकर बहुत खुश हुआ। वहां उन्होंने च्यूड़ा, भंगजीर (एक प्रकार की तिलहन) और अखरोट खाएं। अपने मामा को पूछकर वे सभी बहने गांव के कुएं में चली गईं। वहां उन्होंने पानी में अपनी छाया देखी तो एक दूसरे से बोलने लगीं कि मैं तुमसे अधिक खूबसूरत हूं। हंसते खेलते हुए वे टिनयालि की पहाड़ी चली गईं।

वहां से उन्होंने देखा कि मामा के गांव में तो रात हो चुकी है। उन्होंने जंगलों से आगे ऊंचा खैट खाल देखा, वहां खूब धूप खिली हुई थी। सभी बहने खैट खाल के लिए चल दीं। वहां खैट का राक्षस रहता था। सेम के नागराजा ने उन्हें खैट खाल जाते हुए देख लिया। वह उनके आगे चलने लग गए। सेम के नागराजा ने राक्षस की बुद्धि दुरुस्त कर दी, इसलिए जब वे बहने राक्षस से मिलीं तो उसने उनका खूब आदर सत्कार किया और उनसे पूछा, ‘‘हे छोटी बहनों तुम किस गांव की हो ?’’ उन बहनों ने उसे अपने गांव का नाम बताया। उन्होंने कहा कि वे ऊंचे खैट खाल के पर्वत में घूमने के लिए जा रही हैं। वे सभी खैट खाल पहुंच गईं, पर कहते हैं कि वहां से फिर वापस अपने गांव लौटकर नहीं आईं। सभी बहने खैट खाल जाकर आंछरि बन गईं। राक्षस उनका धर्म भाई बन गया।

जागर में इनके लिए देवी शब्द का उपयोग किया जाता है। आंछरि बनकर वे अलमु बग्याल के यहां जाती हैं, तो वह भी उनका खूब आदर सत्कार करता है। अलमु बग्याल ने आंछरियों के धर्म भाई राक्षस को सवा दोण (एक दोण मतलब 32 किलो) का रोट बनाकर भेंट किया। उसके बाद वे पिंडी के पर्वत में जाकर अदृश्य हो गईं। अलमु बग्याल निःसंतान था। वे नौ बहने आंछरि उसके सपने में आईं और उन्होंने कहा कि अगर वह पिंडी के पर्वत में उनका मंदिर बना देगा तो उसकी संतान हो जाएगी। कहते हैं कि अलमु बग्याल ने वहां पर मंदिर बनवाया और फिर उसके दो पुत्र हुए थे। कहते हैं कि ये आंछरि अब भी सुंदर युवक को देखकर मोहित हो जाती हैं और उन्हें अपने माया जाल में फंसा कर अपने लोक ले जाती हैं। खैट पर्वत पर कई युवकों के गुमशुदा होने की खबरें आती रहती हैं।

स्रोत : उत्तराखंड में प्रचलित लोकोक्तियां

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