डॉ. रमेश ठाकुर
पिछले ही सप्ताह भोपाल की छत्रसाल कॉलोनी के एक व्यवसायी के 8वीं क्लास में पढ़ने वाले इकलौते बेटे ने गेमिंग में फंसकर आत्महत्या की थी। घटना चर्चाओं में थी कि वैसा ही एक और मामला गाजियाबाद में घट गया। सिलसिलेवार रूप से एक ही जैसे मामले लगातार प्रकाश में आ रहे हैं। बीते 24 महीनों में करीब 180 ऐसी ही घटनाएं देशभर में रिपोर्ट की गई हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों में जिस हिसाब से 5 सालों में उछाल आया है, वह निश्चित रूप से रोंगटे खड़े करता है। कौन-सी तरकीब अपनाई जाए, जिससे बच्चे गेमिंग के चुंगल से निकल कर अपने पारंपरिक देशी किस्म के खेलकूदों की ओर मुड़ जाएं।
दरअसल, ऐसी जरूरत गाजियाबाद में तीन बहनों के सुसाइट के बाद और ज्यादा महसूस होने लगी है। क्यों मॉडर्न बच्चे मैदानी खेलों को छोड़कर मोबाइल गेमिंग जैसी आफतों में घुसते जा रहे हैं। ऐसे सवालों का उत्तर समाज के प्रत्येक वर्ग को सामूहिक स्तर पर खोजना चाहिए। टीनएजर्स में गेमिंग की लत जानलेवा बीमारी जैसी हो गई है जिसका ताजा उदाहरण सामने है। कोरियन गेमिंग की आड़ में गाजियाबाद की तीन सगी नाबालिग बहनों ने ‘लवर गेम टास्क’ में खुद को फंसाकर मौत को गले लगा लिया। उनके सुसाइड की खबर समाज में आग की तरह फैली हुई है। तीनों बहनों ने मौत को जिस भयावह अंदाज में अपनाया, उसने अभिभावकों को सबसे ज्यादा झकझोरा है। मृतकों ने अपने पिता के नाम चिट्ठी लिखकर मौत की वजह भी बताई। आठ पन्नों के सुसाइट नोट में उन्होंने अपनी अधूरी चाहत की पूरी दास्तां विस्तार से लिखी। ऐसी-ऐसी वजहें लिखीं, जिन्हें पढ़-सुनकर समाज सोचने पर विवश हुआ है।
घटना की शुरूआती पड़ताल बताती है कि गेम की गिरफ्त में तीनों बहनें ऐसी जकड़ी कि निकल ही नहीं पाई, निकलने की तमाम नाकाम कोशिशें जरूर की। लेकिन दलदल में इतनी फंस चुकी थी, वहां से निकलना उनके लिए नामुकिन हो गया। अंत में तीनों ने नौवीं मंजिल से छलांग लगाकर जीवनलीला समाप्त करना ही मुनासिब समझा। पुलिस घटना की तफ्तीश कर रही है। मामला जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, नई-नई अचंभित करने वाली बातें सामने आ रही हैं। कुछ ऐसी भी बातें जिनपर एकाएक विश्वास करना मुश्किल है। पुलिस की थ्योरी और पड़ोसियों की मानें तो तीनों लड़कियां चौबीसों घंटे गेम में लगी रहती थीं। तीनों ही कोरियन लड़कों से शादी करने पर आमादा थी। गेमिंग के जरिए कोरियन कल्चर को उन्होंने अपने दिल-दिमाग में इस कदर बिठा लिया था कि कोरिया के बिना उनका जीवन बेकार है। उनकी हरकतों से परिवार भी बीते दो सालों से परेशान और चिंतित था। पिता ने तीनों से उनका मोबाइल भी छीन लिया, जिसके चलते उन्होंने लड़ना-झगड़ा शुरू कर दिया था। इसके अलावा लड़कियां रोजाना अपने परिवार पर कोरिया ले जाने का दबाव डालने लगी थीं। सुसाइड में तीनों बहनों ने दुखभरी इमोजी भी बनाई, जिसमें पिता चेतन कुमार को ‘सॉरी पापा’ लिखकर, अंत में अलविदा शब्द लिखा।
ये बात अब साबित हो चुकी है कि ज्यादातर गेम साइको टाइप लत परोसने लगे हैं। बच्चों को ज्यादा से ज्यादा अपनेपन का एहसास कराने की जरूरत है। एकबार जो इसकी गिरफ्त में फंसा, आसानी से छुटकारा नहीं पा सकता। इस झकझोर देने वाली घटना को ध्यान में रखकर ये समझना होगा कि आखिर कोरियाई कल्चर टीनएजर्स को क्यों लुभाने रहा है? दरअसल, कोरियाई कल्चर की कुछ खासियतें हैं। उनका आधुनिक ड्रामा और के-पॉप प्यार और पारिवारिक भावनाएं लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। उनके अपनेपन से लोग आसानी से उनसे जुड़ जाते हैं। कोरिया की आधुनिक और पारंपरिक जीवनशैली, के-फूड, फैशन और के-ब्यूटी भी युवाओं को खासा आकर्षित करती है। भारत में इस समय ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कोरियन फिल्म, ड्रामा, सीरियल और मूवीज खूब पसंद किए जा रहे हैं। इन सबसे बढ़कर युवाओं पर उनका गेंमिंग सेक्टर ज्यादा प्रभाव डाल रहा है।
युवा हो रही पीढ़ी पर ऑनलाइन गेमिंग के गहरे मानसिक असर से बचाने की बड़ी चुनौती है। गाजियाबाद जैसी घटनाओं के चलते नाबालिगों का असमय चले जाना, अभिभावकों को भीतर तक आघात देता है। बदले हुए युग की आधुनिक तस्वीरें निश्चित रूप से डरावनी हैं। मैदान, पार्क, खेलकूद की तमाम जगहें बच्चों के बिना सूने पड़े हैं। उन्हें छोड़कर बच्चे मोबाइलों में घुसे हैं। स्कूल से आने के बाद बच्चे मोबाइल पर झपट्टा मारते हैं। इस दुखद घटना से हम सभी को सीखने की जरूरत है।
घटना 4 फरवरी सुबह करीब सवा दो बजे गाजियाबाद के ‘भारत सिटी सोसाइटी’ की है। पिता चेतन ने दो शादियां की थी, पहली बीवी से दो बेटियां हुई। लेकिन बेटे के चाहत में चेतन ने अपनी साली से ब्याह किया, उससे भी बेटी हुई। तीनों की उम्र महज 16, 14 और 12 वर्ष के आसपास थी। तीनों एक ही कमरे में ज्यादातर समय साथ बिताती थीं। कोविड के बाद किन्हीं वजह से उनका स्कूल जाना बंद हुआ। उसके बाद कथित तौर पर एक मोबाइल गेमिंग ऐप के प्रभाव में आ गईं।
दरअसल, यही बात अपने आप में सवाल खड़े करती है। बिना किसी हस्तक्षेप के बच्चे इतने साल अपनी पढ़ाई को कैसे गंवा सकते हैं? क्या उन्हें कोई दिक्कत थी। सीखने-पढ़ने में कोई कठिनाई थीं या फिर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्याएं थीं। इसके अलावा कोई सामाजिक अलगाव या कुछ और समस्याएं थीं, जिस पर परिवार ने ध्यान नहीं दिया? इन सवालों को तह तक जांच-पड़ताल करने की जरूरत है, क्योंकि एकाएक गेम की लत के चलते तीनों का दुनिया छोड़ देना, गले नहीं उतरता।
अगर मौत का कारण गेम है तो इतना समझ लेना चाहिए, इस समस्या ने सभी के दरवाजों पर दस्तक दे दी है। अपने बच्चों को कैसे बचाना है, ये खुद पर निर्भर करता है। क्योंकि हमारे देश में ऐसा संभव नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया की भांति हमारे यहां भी 16 वर्ष तक के बच्चों को सोशल मीडिया पर बैन लग सकता है। ये अभिभावकों के लिए खुली चुनौती और चेतावनी जैसी है। ऐसी चेतावनी जो बच्चों को गेमिंग जैसी बीमारी से बचाने का आह्वान करती है। बच्चों पर निगरानी रखनी होगी। मोबाइल में देखी उनकी सामग्रियों की जांच करनी चाहिए। अगर कुछ गलत देखता है तो उसे समझना होगा। किशोरावस्था में आत्महत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए इसे किसी भी हालत में रोकना होगा।
लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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