उमाशंकर पाण्डेय
वैश्विक जल संकट के बीच भारत में आशा का नया संचार हुआ है। पानी खासतौर पर भूजल के संरक्षण के प्रयास निश्चित तौर पर अच्छे संकेत दे रहे हैं। भूजल के अंतर्गत पृथ्वी का कुल 99 प्रतिशत तरल मीठा पानी समाहित है । यह हमें कई तरह के सामाजिक, आर्थिक तथा पर्यावरणीय लाभ प्रदान करता है। इसमें जलवायु लचीलापन भी शामिल है। देश में भूजल कृषि गतिविधियों और पेयजल आपूर्ति का प्राथमिक आधार है। यह लगभग 62 प्रतिशत सिंचाई आवश्यकता, 85 प्रतिशत ग्रामीण खपत और 50 प्रतिशत शहरी मांग को पूरा करता है। तीव्र जनसंख्या वृद्धि, कृषि गहनता, औद्योगिक विस्तार और शहरीकरण ने देश में सामूहिक रूप से भूजल प्रणालियों पर दबाव बढ़ा दिया है। इसलिए सतत भूजल प्रबंधन प्रथा को अपनाना अनिवार्य हो गया है। जल का विषय राज्य सरकारों के दायरे में आता है, मगर केंद्र सरकार विशेष रूप से जल शक्ति मंत्रालय संबंधित मंत्रालयों के माध्यम से देश भर में दीर्घकालिक भूजल प्रबंधन को मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभाता है।
दरअसल भूजल को समझना जरूरी है। भूजल वह मीठा पानी है जो मिट्टी और चट्टानों में रिसकर भूमिगत यानी भूमि के अंदर संग्रहित हो जाता है, जहां से यह स्वाभाविक रूप से बाहर आता है। यह नदियों और धाराओं के जलस्तर को बनाए रखता है तथा आर्द्रभूमि में पौधों और जंतुओं के आवास को मजबूती से प्रभावित करता है। भूमिगत परत जिसमें पर्याप्त मात्रा में भूजल संग्रहीत और संचालित हो सके, उसे जलभृत कहा जाता है। जलभृतों से पानी स्वाभाविक रूप से बहकर झरनों, धाराओं और नदियों में योगदान दे सकता है या खुदाई वाले कुओं, ट्यूबवेल और बोरवेल के माध्यम से पंप किया जा सकता है।
यह भी समझना जरूरी है कि भूजल प्रबंधन एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन और संरक्षण का हिस्सा है। भूजल प्रबंधन के मूल आधार हैं - भूजल (जलभृतों) के कार्य और उपयोग, उन पर कार्यरत समस्याएँ और दबाव (खतरे) तथा प्रबंधन उपायों का भूजल प्रणाली की समग्र कार्यप्रणाली और स्थिरता पर प्रभाव। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अनुसार, भूजल संसाधनों के सतत एवं संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी भूजल प्रबंधन में 4 प्रमुख प्राथमिकताएं आवश्यक हैं। देश में व्यापक भूजल भंडार हैं, जिनकी भौतिक विशेषता और उपलब्धता विभिन्न क्षेत्रों में काफी भिन्न है। फिर भी हाल के दशकों में इन संसाधनों पर अत्यधिक निकासी, घटती गुणवत्ता और सीमित नियमन से तनाव बढ़ा है, जो दीर्घकालिक स्थिरता पर गंभीर चिंता उत्पन्न करता है। भूजल प्रणालियों पर बढ़ता दबाव तीव्र और मुख्यतः अनियमित पंपिंग से देश के कई हिस्सों में जलस्तर में तेजी से गिरावट आई है। यह तथ्य भूमिगत स्रोतों पर हमारी बढ़ती निर्भरता को भी दर्शाता है।
इससे जल गुणवत्ता का ह्रास होना स्वाभाविक है। खनन गतिविधियों, औद्योगिक अपशिष्टों और कृषि प्रथाओं से उत्पन्न प्रदूषण साथ ही आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे प्राकृतिक तत्वों ने क्रमिक रूप से भूजल गुणवत्ता को प्रभावित किया है। यह प्रवृत्ति दीर्घकालिक पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है। अनियंत्रित निकासी भी इसके कारक हैं। बढ़ते भूजल तनाव और सतत जल सुरक्षा की जरूरत के जवाब में केंद्र सरकार ने भूजल प्रबंधन को मजबूत करने, पुनर्भरण व संरक्षण को बढ़ावा देने, वैज्ञानिक आकलन में सुधार लाने तथा पूरे भारत में सहभागी एवं परिणामोन्मुखी भूजल प्रबंधन को प्रोत्साहित करने वाली व्यापक नीतियों, कार्यक्रमों एवं समुदाय-प्रेरित पहलों का समूह शुरू किया है। इनमें मॉडल भूजल (विकास एवं प्रबंधन का नियमन और नियंत्रण) विधेयक प्रमुख है। इस मॉडल विधेयक को सभी राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों के साथ साझा किया गया है। इनमें से 21 ने इसे अपनाया है। इनमें बिहार, पंजाब, हरियाणा एवं हिमाचल प्रदेश प्रमुख रूप से शामिल हैं। यही नहीं, केंद्र सक्रिय रूप से राज्य सरकारों के साथ संवाद करता है, ताकि भूजल संसाधनों का विवेकपूर्ण नियमन एवं सतत प्रबंधन हो।
जल शक्ति अभियान, कैच द रेन भी प्रमुख है। इस अभियान की शुरुआत 22 मार्च, 2021 को विश्व जल दिवस के अवसर पर की गई। यह अभियान जल संरक्षण पर राष्ट्रव्यापी जागरूकता निर्माण एवं सामूहिक कार्रवाई को हर बूंद गिनती का संदेश मजबूत करते हुए प्रोत्साहित करता है। यह देश भर के नागरिकों को व्यावहारिक उपायों एवं समुदाय-स्तरीय सहभागिता से भारत के जल भविष्य के संरक्षण में योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। इस अभियान के माध्यम से जल संरक्षण एवं वर्षा जल संचयन, सभी जल निकायों की पहचान, जियो-टैगिंग एवं सूचीबद्धता, साथ ही जल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक योजना, सभी जिलों में जल शक्ति केंद्र स्थापित करना, केंद्रित वनीकरण और जागरुकता सृजन पर जोर दिया जाता है। साथ ही निष्क्रिय बोरवेलों का पुनर्जीवन भी किया जा रहा है। यह भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देता है।
जल संचय जन भागीदारी पहल को इसमें समाहित किया गया है। यह अभियान 06 सितंबर, 2024 को शुरू किया गया। अटल भूजल योजना (अटल जल) सात राज्यों गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश के जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों में समुदाय-नेतृत्व वाले सतत भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। 25 दिसंबर, 2019 को शुरू की गई यह योजना जल जीवन मिशन के लिए जल स्रोतों की स्थिरता का समर्थन करती है। यह किसानों की आय दोगुनी करने के सरकारी लक्ष्य का भी समर्थन करती है तथा समुदायों में जिम्मेदार जल उपयोग को प्रोत्साहित करती है। यह जागरूकता सृजन, स्थानीय क्षमता निर्माण, अन्य सरकारी योजनाओं से समन्वय तथा उन्नत कृषि प्रथाओं को बढ़ावा देने में भी सहायता करती है।
यही नहीं 24 अप्रैल, 2022 को शुरू किया गया मिशन अमृत सरोवर देश के सभी जिलों में अमृत सरोवरों (तालाबों) के निर्माण का समर्थन करता है। प्रत्येक तालाब का न्यूनतम क्षेत्रफल एक एकड़ (0.4 हेक्टेयर) तथा जल संग्रहण क्षमता लगभग 10,000 घन मीटर निर्धारित है। मेड़बंदी- खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़ जैसे सामुदायिक जल संरक्षण के प्रयास असरकारी हो रहे हैं। प्रधानमंत्री ने देशभर के प्रधानों को परंपरागत तथा नवीन दोनों विधियों से जल संरक्षण के प्रयासों के लिए पत्र लिखा है। सामुदायिक जल संरक्षण के प्रयास का असर बुंदेलखंड में दिखने लगा है। यह मिशन जल संरक्षण बढ़ाने, सिंचित क्षेत्र का विस्तार करने तथा भूजल स्तर सुधारने का लक्ष्य रखता है, जिसमें अमृत सरोवरों का पुनर्जीवन एवं निर्माण प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण का समर्थन करता है। इससे साफ है कि देश में जल संरक्षण के सरकारी प्रयास भगीरथ हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वह दिन दूर नहीं, जब देश में पानी की कमी नहीं होगी।
लेखक, प्रथम जल योद्धा पुरस्कार से अलंकृत और जल संरक्षण के क्षेत्र में पद्मश्री हैं।

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