हिंदी के नाम पर अब भाषण की जरूरत नहीं

अमिता सक्सेना


हिंदी साहित्य आठवीं शताब्दी से माना जाता है, लेकिन 11वीं शताब्दी के करीब हिंदी का रूप प्रखर होता गया। 13वीं शताब्दी तक धर्म के क्षेत्र में काफी उतार-चढ़ाव आ गया। इस काल में भक्ति काल का जन्म हुआ। इन कवियों ने हर बोलचाल की भाषा को हिंदी के साथ जोड़ दिया। फिर अंग्रेजी शासन ने भारतीय जीवन को जड़ से परिवर्तन के माहौल में ला खड़ा किया। एक नए युग का उदय हुआ। नए-नए सामाजिक संघर्षों ने जन्म लिया। कांग्रेस के अधिवेशन में हिंदी को राष्ट्रभाषा का स्थान दिया गया। भारत में जगह-जगह राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों का गठन किया गया, जिन्होंने हिंदी के प्रचार के लिए प्रबोध, प्रवीण परीक्षाएं आयोजित कीं। इन परीक्षाओं का उद्देश्य अहिन्दी भाषियों को हिंदी के योग्य बनाना था। कुछ कारणों से यह प्रयास अपने उद्देश्य को पाने में असफल रहा।

हर देश की अपनी एक राष्ट्रभाषा जरूर होती है और सभी देशवासी उस राष्ट्रभाषा पर गर्व करते हैं। अपने सारे सरकारी और गैर सरकारी काम उसमें करने में गर्व महसूस करते हैं, लेकिन भारत में ऐसा क्यों नहीं है ? भारत की कोई राष्ट्रभाषा ही नहीं है, जबकि यह एक विशाल देश है।

अब प्रश्न उठता है, राष्ट्रभाषा की आवश्यकता ही क्यों है ? बच्चा जो बचपन से अपने घर और समाज में भाषा बोलता, सुनता है, उसे वह सीखता नहीं है, बल्कि उसे अपने घर, परिवार व समाज से ग्रहण करता है, इसीलिए वो उस भाषा में अपने आप सारे कौशल प्राप्त कर लेता है। यहाँ कौशल से अर्थ भाषाई कौशल से है। लेकिन जो भाषा बच्चों को सीखनी पड़े, उसमें वह कितनी भी मेहनत कर ले, उसमें लिखना और बोलना सीख ले, लेकिन उस भाषा में सोचना वह शायद ही कभी सीख पाएगा। अगर हम अपने सरकारी कामों के लिए किसी विदेशी भाषा पर निर्भर हैं, तो हमारी अपनी भाषा, हमारे त्यौहार, हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता कहीं ना कहीं जरूर पीछे छूटेगी। यह हमारे लिए अपमान का विषय ही है। हर देश के संविधान में एक राष्ट्रभाषा होती है और सभी लोग छोटे से लेकर बड़ा तक बिना धर्म के भेद के राष्ट्रभाषा का आदर करते हैं, लेकिन भारत में कुछ अलग ही हुआ।

भारत में हिंदी पुरातन काल से अपनी पहचान बनाने वाली बोली रही है। 12 से ज्यादा राज्यों में मातृभाषा के तौर पर बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। भारत के लगभग सभी राज्यों में हिंदी बोली, सुनी और समझी जाती है। दुःख की बात है कि हिंदी को संविधान में राष्ट्रभाषा का दर्जा अभी तक नहीं मिला। तमिल और हिंदी के बीच चुनाव में नेहरू की कास्टिंग वोटिंग के कारण हिंदी राजभाषा बनी। तमिल में रहने वालों को हिंदी से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है, ना ही वे हिंदी के खिलाफ हैं, लेकिन राजनीतिक रोटियां सेकने वाले इस मुद्दे को ज्वलंत बनाकर रखना चाहते हैं। तमिल के लोग पूरे देश में काम करते हैं, हिंदी बोलते, समझते हैं और हिंदी साहित्य की भी सराहना करते हैं, लेकिन राजनीति के ठेकेदार हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बनने देते। व्यवहारिक जमीन पर देखें, तो याद करना कठिन है कि शुद्ध हिंदी कब और कहां पढ़ी थी।

हिंदी एक विशाल आंचल है, जिसने विदेशी, देसी, संकर तद्भव शब्दों को समेटा है। अंग्रेजी से हमारा कोई बैर नहीं, पर जिस प्रकार विदेशी भाषाओं को भारत में फलने-फूलने का हक है, उसी तरह से भारत में जन्मीं भाषाओं को भी भारत में फलने-फूलने का अधिकार मिलना ही चाहिए। हालांकि सरकारी संस्थानों में हिंदी अनिवार्य रूप से लिखी और पढ़ी जाती है, लेकिन कभी-कभी स्थिति हास्यापद या दयनीय हो जाती है। जब कुछ इस तरह से लिखा जाए कि अर्थ का अनर्थ हो जाए !

यहां एक सच्चाई पर प्रकाश डालना भी जरूरी है। प्राथमिक परीक्षा आईपीएस की, उसमें हिंदी माध्यम से परीक्षा में भाग लेने वाले परीक्षार्थियों की संख्या कम हो रही है। संघ लोक सेवा आयोग की 62वीं वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2009 में आईपीएस प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने वाले 11,504 विद्यार्थियों में से 4,861 हिंदी माध्यम के थे और 2011 में यह संख्या सिर्फ 1,700 ही रह गई। लेकिन परीक्षार्थी 11,230 थे। अगर हम तथ्य पर बारीकी से ध्यान दें, तो पता चलता है कि हिंदी भाषी क्यों नाकाम हो रहे हैं।

कारण साफ है, आईपीएस की प्रारंभिक परीक्षा का पैटर्न। तार्किक सोच और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेने में समर्थ आईपीएस अधिकारियों की खोज करने के लिए परीक्षा के पैटर्न में बदलाव किया गया, मगर जरूरी है कि इसकी शुरुआत स्कूली पाठ्यक्रम से की जाए। इस कमी की कीमत हिंदी भाषी परीक्षार्थियों को चुकानी पड़ रही है। यह वाकई चिंता की बात है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सवालों को हल करने के लिए हिंदी भाषी को बहुत अधिक समय लगाना पड़ता है, क्योंकि अंग्रेजी के प्रश्न वो पढ़ नहीं पाते और हिंदी का जो अनुवाद होता है, वह इतना क्लिष्ट होता है कि अच्छे अच्छा चक्कर खाकर गिर पड़ें। ऐसी हालत में अंग्रेजी के बच्चे तो अंग्रेजी के सवाल पढ़-समझ पाते हैं, लेकिन हिंदी भाषी समझ नहीं पाते। अब जरूरी है इस समस्या को दूर किया जाए। अनुवाद बोलचाल की भाषा में हो, जैसे हम रोजमर्रा की जिंदगी में जीते, बोलते हैं। जो कठिन शब्द प्रयोग में नहीं आते या हमने कभी सुने ही नहीं, उन शब्दों को प्रतियोगी परीक्षा में रखकर बच्चों का समय नष्ट करने का क्या अर्थ है ? इसका अर्थ यही निकल सकता है कि हिंदी भाषी पिछड़ जाएं और अगर यह सच नहीं है, तो क्यों इस पर काम नहीं किया जा रहा।

अब बात करते हैं सरकारी योजनाओं की, जो जन जन के लिए बनायी जाती हैं। गरीबों के लिए बनाई गई योजनाएं पूर्ण रूप से गरीबों तक नहीं पहुंच पातीं। जो आम लोग हैं, उनकी भाषा हिंदी भी नहीं, बल्कि प्रांत की भाषा है, ऐसे में वे अंग्रेजी कहां से समझ सकते हैं। ऐसी स्थिति में अंग्रेजी भाषा में सरकारी योजनाओं का प्रचार करने का क्या अर्थ है ? अधिकांश सरकारी वेबसाइट अंग्रेजी में हैं, यह चिंता का विषय है। कुछ वेबसाइटों में अब हिन्दी भी जोड़ी गई है, लेकिन काम या तो पूरा नहीं हो सका या उसकी भाषा इतनी जटिल है कि आम आदमी नहीं समझ सकता।

जब आम आदमी 10 हजार से लेकर 50 हजार रुपए तक में वेबसाइट बनवा सकता है, तो सरकारी वेबसाइटों पर क्यों लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। इतनी कठिन हिंदी जो बड़े भाषाविद् भी ना समझ सकें, फिर आम आदमी जो स्कूल भी ना गया हो, कैसे समझेगा अंग्रेजी?

सरकार को इन कमियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हिंदी दिवस के नाम पर कार्यक्रमों पर जनता की गाढ़ी कमाई खर्च कर दी जाती है। लेकिन, जमीनी स्तर पर हिंदी को कमजोर बनाकर रखा गया है। हिंदी जन जन की भाषा है, तो उसे जन-जन से जोड़े रखना बहुत जरूरी है।

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