सूबे के 21 जिलों का पानी जहर

  • आर्सेनिक व फ्लोराइड की मात्रा खतरनाक स्तर पर
  • राजधानी के तीन बड़े भू-भाग भी चपेट में
  • कई खतरनाक बीमारी से जूक्ष रहा पूरा का पूरा गांव

सूबे के 21 जिलों का पानी लोगों के लिए धीमा जहर बन चुका है। इन 21 जिलों में पटना का बड़ा श्ू-भाग श्ी षामिल है। कहीं-कहीं तो स्थिति काफी बदतर हो चुकी है। मामले इतने गंभीर हैं कि किसी-किसी गांव के अधिकांष लोगों के हाथ-पैर की हड्डियां टेढ़ी हो चुकी हैं। कहीं अंगुली एवं नख गलने के मामले ज्यादा हैं। साथ ही बाल झ्ारने, दांतांे के गलने, आंत एवं चर्म रोग की समस्या से लोग बुरी तरह प्रभावित हैं। ऐसा पेयजल में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड की मात्रा सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाने के कारण हुआ है। राजधानी स्थित राज्य स्तरीय जल जांच प्रयोगषला (पीएचईडी) एवं एएन कॉलेज के पर्यावरण एवं जल प्रबंधन विभाग के संयुक्त प्रयास से इस बात का खुलासा हो सका। जब जिलों के विभिन्न क्षेत्रों से पेयजल को नमूना के रूप में उठाया गया और इसकी जांच की गयी, तो लोग चकित रह गये। विषेषज्ञों की टीम ने दूर-दराज के गांवों का दौरा किया। पूरा का पूरा गांव ही प्रभावित मिला। कुछ और संस्थाएं इसपर काम कर रही हैं।

अगर विषेषज्ञों की बात मानें, तो पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा 0.01 मिली ग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। वहीं फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिली ग्राम प्रति लीटर से न तो कम हो और न ही ज्यादा होनी चाहिए। एएन कॉलेज, पटना के पर्यावरण एवं जल प्रबंधन विभाग के रिसोर्स पर्सन डॉ विनोद षंकर एवं राज्य स्तरीय जल जांच प्रयोगषाला (पीएचईडी), पटना के प्रयोगषाला प्रभारी डॉ अजय कुमार उपाध्याय ने जो जांच के नतीजे पाये, इस प्रकार हैं। पहले बात आर्सेनिक की करते हैं। पटना के तीन बड़े क्षेत्रों में 0.70 मिली ग्राम प्रति लीटर, बक्सर में 0.17 मिली ग्राम प्रति लीटर, भोजपुर में 0.18, सारण में 0.08, वैषाली में 0.11, पूर्वी चंपारण में 0.04, दरभंगा में 0.08, समस्तीपुर मंे 0.075, पूर्णिया मंे 0.05, किषनगंज मंे 0.06, कटिहार में 0.06, लखीसराय मंे 0.07, खगड़िया में 0.03, भागलपुर में 0.07 मिली ग्राम प्रति लीटर है। दूसरी तरफ फ्लोराइड की मात्रा पर नजर डालें, तो बक्सर में 1.9 मिली ग्राम प्रती लीटर, रोहतास मंे 3.3, भोजपुर में 2.4, औरंगाबाद में 2.9, नवादा मंे 7.4, सुपौल में 2.2, मुंगेर में 12.7, जमुई मंे 6.0 और बांका में 3.4 मिली ग्राम प्रति लीटर है।

डॉ. विनोद षंकर बताते हैं कि आर्सेनिक के बढ़ने से पटना जिला का बाढ़, मनेर और ग्यासपुर क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित है। वहीं भोजपुर का षाहपुर, पहलपुर, नवादा नरायजपुर, भरौली, करनामपुर, अमराही नवादा, बरिसावन क्षेत्र, बक्सर का अर्जुनपुर, ब्रहापुर, चूरामनपुर क्षेत्र, समस्तीपुर का विद्यापति नगर, कांचा, षाहपुर पटोरी, भट्ठाबाद क्षेत्र, सारण का गंगाजल, सिताब दियारा क्षेत्र और बेगूसराय का नारेपुर, बिहट एवं बरौनी क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित है। डॉ. विनोद ने फ्लोराइड के खतरनाक क्षेत्रों में इन्हें चिन्हित किया है – मुंगेर जिला का हवेली खड़गपुर क्षेत्र, बांका का बउसी, औरंगाबाद का देव, मदनपुर, भभुआ का रामगढ,़ भगवानपुर व नाउन क्षेत्र, नवादा का रोह, रोहतास का कुद्रा, नासरीगंज, दवाथ, जमुई का क्षेत्र, बक्सर का राजपुर क्षेत्र और सुपौल का बसंतपुर क्षेत्र फ्लोराइड से सबसे ज्यादा प्रभावित है।

डॉ. अजय कुमार उपाध्याय बताते हैं कि प्राकृतिक एवं कुछ मानवीय कारणों से पेयजल दूषित हो रहा है। पीएचईडी द्वारा प्रभावित जिलों में काम किया जा रहा है। वाटर टॉवर बनाकर सुरक्षित और पीने योग्य पानी सप्लाई सिस्टम स्थापित किया जा रहा है। अगर कोई व्यक्तिगत रूप से अपने घर के पानी की जांच करवाना चाहे, तो पीएचईडी में निर्धारित राषि जमा कर करवाया जा सकता है। साथ ही सभी जिलों के जिला जल जांच प्रयोगषाला में भी पानी की जांच की सुविधा उपलब्ध है।

डॉ विनोद बताते हैं कि आर्सेनिक प्रभावित जिलों में इतने खतरनाक स्तर तक इसकी मात्रा जा पहुंची है कि इससे पेड़-पौधे व फसल प्रभावित हो रहे हैं। चावल पर आर्सेनिक का क्या प्रभाव है, इसकी जांच की गयी। पता चला कि यह भी प्रभावित हो चुका है और भोजन के माध्यम से मानव षरीर को प्रभावित कर रहा है। डॉ विनोद कहते हैं, ‘‘हम पर्यावरण व प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर खुद को संकट में डाल रहे हैं। साथ ही आने वाली पीढ़ी को क्या देने जा रहे हैं, सबके सामने है।’’

बहरहाल, केंद्र व राज्य सरकार इस दिषा में अबतक लाखों रुपए खर्च कर चुकी है। इस समस्या का कोई स्थायी व ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। हर दिन मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। ग्रामीणों के पास न तो इतना पैसा है कि वे घर छोड़कर कहीं और बस जाएं और न ही इलाज करवाने का खर्च वहन कर सकते हैं। ऐसे में उनकी स्थिति बस वैसी ही हो गयी है – जाएं तो जाएं कहां!

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